बाबा कहलाने से पहले, वे एक लड़के थे जो शिरडी में नीम के पेड़ के नीचे प्रकट हुए और जिन्हें कुछ भी नहीं चाहिए था।
इससे पहले कि कोई उन्हें बाबा कहता, वे बस एक लड़का थे।
एक अजीब लड़का। एक दिन वह शिरडी के छोर पर एक नीम के पेड़ के नीचे आ बैठा, और कोई न बता सका कि वह कहाँ से आया है। उम्र यही कोई सोलह बरस। न कोई माँ-बाप जिन्हें कोई जानता हो, न कोई गाँव, न कोई कहानी। वह बस आ गया, और बैठ गया।
वह दोपहर की तपती धूप में बैठा रहता, जब बाक़ी सब छाँव ढूँढ़ते फिरते। वह रात की ठंड में भी बैठा रहता। लोग सुबह पेड़ के पास से गुज़रते तो उसे वहीं पाते; शाम को फिर गुज़रते तो वह ज़रा भी न हिला होता, मानो पेड़ की तरह वह भी वहीं ज़मीन से उग आया हो।
वह किसी से कुछ न माँगता। किसी का साथ न ढूँढ़ता। उसे मानो किसी चीज़ की चाह ही न थी, और यही बात, सबसे बढ़कर, गाँव को बेचैन कर देती थी।
“यह कौन है?” लोग एक-दूसरे से पूछते। “किसका बेटा? कहाँ से आया है?”
कुछ को उत्सुकता थी। कुछ डरते थे। कुछ ने तो तय कर लिया कि यह ज़रूर पागल है, भला कौन नौजवान पेड़ के नीचे अकेला बैठा रहता है, न कुछ चाहता, न कुछ कहता? पर कुछ ऐसे भी थे जिन्हें बस उसके पास बैठना अच्छा लगता। वे कोई छोटा-सा बहाना बनाकर नीम के पास से गुज़रते, और फिर पाते कि वहाँ से जाने का मन ही नहीं करता।
वह नौजवान था, फिर भी उसके चेहरे में कुछ ऐसा था जो ज़रा भी नौजवान न लगता था। एक बूढ़ी औरत उसे उम्र भर याद रखती रही। वह तो बस एक लड़का था, वह कहती, पर जब तुम उसकी ओर देखते, तो एक अजीब-सा एहसास होता कि यह कोई बहुत पुराना है।
आख़िर गाँव ने ठान लिया कि इसकी सच्चाई जानकर रहेंगे। और जैसे उन दिनों ऐसी बातें सुलझाई जाती थीं, जवाब एक ऐसे आदमी के ज़रिए आया जिसे गाँव के देवता की वाणी बोलने वाला माना जाता था। खोदो, उसने कहा। नीम के पास ज़मीन खोदो।
सो उन्होंने खोदा।
एक चपटे पत्थर के नीचे उन्हें ज़मीन में एक कोठरी मिली, क़रीने से रखी ईंटें, और वे निशान जो बताते थे कि बहुत पहले यहाँ कोई रहा था, या बैठकर साधना करता था। अब तो ज़रूर इसका भेद हाथ लग गया।
वे लड़के की ओर मुड़े।
पर उसने वह न दिया जो वे चाहते थे। यह मेरे गुरु की जगह है, उसने कहा, मेरे उस्ताद की, और पवित्र। उसने उनसे कहा कि इसे सँभालकर रखें, और छेड़ें नहीं।
बस इतना ही।
उस कोठरी ने भेद सुलझाने के बजाय उसे और गहरा कर दिया। किसका गुरु उस पेड़ के नीचे बैठा करता था? लड़के ने और कुछ न कहा।
फिर एक दिन, वह चला गया। न कोई बात, न विदा। पेड़ वहीं रहा। गाँव अपनी राह चलता रहा। पर लड़का जैसे आया था वैसे ही चला गया, और किसी को पता न चला कहाँ।
बरस बीते। बच्चे बड़े हुए। शिरडी पर मौसम बार-बार पलटते रहे, और वह लड़का बूढ़ों की आधी-अधूरी यादों में बचा रह गया, एक सुंदर नौजवान फकीर, जो कभी नीम के नीचे बैठा करता था और किसी और ही दुनिया का जान पड़ता था।
और फिर, एक दिन गाँव में एक बारात आई।
मुसाफ़िरों के बीच एक नौजवान फकीर भी था।
उस बारात में किसी को न पता था कि नीम के नीचे वाला वही लड़का लौट आया है।
और किसी को न पता था कि इस बार, वह यहीं रुकने आया है।