बाबा गेहूँ पीसते हैं और आटा गाँव की सीमा पर बिखेरा जाता है — और महामारी लौट जाती है। श्री साई सत्चरित्र की पहली कथा, नए ढंग से।
एक सुबह, बाबा गेहूँ पीसने लगे।
उन्होंने मस्जिद में एक हाथ-चक्की मँगवाई, ज़मीन पर एक बोरा बिछाया, और चक्की उस पर रख दी। आस्तीनें चढ़ाईं, लकड़ी का हत्था थामा, और चक्की घुमाने लगे। घूम… घूम… और घूम। पत्थर के नीचे गेहूँ चटककर सफ़ेद होता गया।
किसी की समझ में न आया कि क्यों।
बाबा के पास कुछ भी न था। वे हर दिन भीख माँगकर खाते, अनाज का कोई भंडार न रखते, और उनका कोई परिवार न था जिसे खिलाना हो। फिर भी वे सुबह की तपती धूप में बैठे वह गेहूँ पीस रहे थे, जिसकी उन्हें कोई ज़रूरत ही न थी।
गाँव में बात फैल गई, जैसे बात फैला करती है। मस्जिद के दरवाज़े पर देखने वालों की भीड़ जुट गई। आख़िर चार औरतों से रहा न गया; वे आगे बढ़ीं, बाबा के हाथ धीरे से हटाए, ख़ुद हत्था थामा, और बाबा का नाम गाते-गाते गेहूँ पीसने लगीं।
एक पल के लिए बाबा का चेहरा तमतमा उठा, मानो अभी क्रोधित हो जाएँगे।
फिर वे मुस्कुरा दिए, और उन्हें पीसने दिया।
जब पिसाई पूरी हुई, औरतें आटा आपस में बाँटने लगीं, इस बात से ख़ुश कि थोड़ा-सा बाबा का प्रसाद घर ले जाएँगी। बाबा ने उन्हें रोक दिया।
“यह लो,” उन्होंने कहा, “और गाँव की सरहद पर बिखेर आओ।”
अच्छा-भला आटा, गाँव की सीमा पर फेंक देना। कोई तुक न था इसमें। पर अब तक शिरडी के लोग जान चुके थे कि बाबा की बातें, चाहे कितनी ही अनोखी क्यों न हों, मान लेने में ही भलाई है। सो वे आटा ले गए और गाँव की सीमा पर बिखेर आए, जैसा बाबा ने कहा था।
बाद में शिरडी के लोग कहते थे कि उस बरस जो हैज़ा गाँव की ओर बढ़ रहा था, वह कभी सरहद पार न कर सका। वह लौट गया, वे कहते, आटे की उस बिखरी लकीर पर आकर।
शायद ऐसा ही हुआ हो।
बाबा के साथ यही मुश्किल थी, शुरू से ही। आप अपनी आँखों से उन्हें देखते रह जाते, और फिर भी कह न पाते कि आपने क्या देखा।