चाँद पाटील की खोई घोड़ी, ज़मीन से निकलती आग और पानी, और खंडोबा मंदिर पर बाबा को मिला उनका नाम।
चाँद पाटिल की घोड़ी खो गई थी।
दो महीने तक उसने उसे ढूँढ़ा, सड़कें, खेतों की पगडंडियाँ, गाँव, नदी के किनारे। कुछ न मिला। आख़िर हारकर वह घर की ओर चल पड़ा, कंधे पर ख़ाली ज़ीन लटकाए, क्योंकि और कुछ ढोने को था ही नहीं।
रास्ते में उसने एक फकीर को एक आम के पेड़ के नीचे बैठे देखा, बग़ल में एक छोटी लाठी, हाथ में मिट्टी की चिलम।
फकीर ने उसकी ओर देखा, और फिर ज़ीन की ओर।
“यह क्यों ढो रहे हो,” उसने पूछा, “जब नीचे घोड़ा ही नहीं?”
चाँद पाटिल ने बताया। दो महीने। एक अच्छी घोड़ी, गुम।
फकीर मुस्कुराया, मानो सारी बात उतनी उलझी थी ही नहीं जितनी चाँद पाटिल ने बना रखी थी। “जाओ, नाले के पास देखो,” उसने कहा।
बात बेतुकी थी। चाँद पाटिल दो महीने से ढूँढ़ रहा था; उस नाले के पास से तो वह न जाने कितनी बार गुज़रा होगा। पर फकीर की आवाज़ में कुछ ऐसा था कि बहस करना बेकार लगा। वह गया।
घोड़ी वहीं थी।
वह एक पल ठगा-सा उसे देखता रहा, फिर उसे लेकर पेड़ के पास लौटा, मन सवालों से भरा हुआ। इस अजनबी को यह कैसे पता चला?
फकीर को जैसे इसमें कुछ ख़ास लगा ही नहीं। उसने चाँद पाटिल को चिलम पीने को कहा। पर एक अड़चन थी, चिलम सुलगाने को आग न थी, और तैयार करने को पानी।
तो फकीर ने अपना चिमटा उठाया और ज़मीन में गड़ा दिया, और सूखी मिट्टी से एक दहकता अंगारा निकल आया। उसने फिर ज़मीन पर मारा, और जहाँ मारा वहाँ पानी उमड़ आया।
उसने चिलम सुलगाई, एक कश लिया, और आगे बढ़ा दी, इतने इत्मीनान से मानो सूखी ज़मीन से आग और पानी रोज़ ही निकलते हों, जो माँगे उसके लिए।
चाँद पाटिल के पास कहने को कुछ न था। यह कौन है? इसे कैसे पता चला कि खोई घोड़ी कहाँ खड़ी है, और यह मिट्टी से आग और पानी बुला लेता है, और फिर भी इतने चैन से बैठा है, मानो यह दुनिया की सबसे मामूली बात हो?
उसने फकीर से मिन्नत की कि वह उसके घर चले। फकीर मान गया, चाँद पाटिल को हैरान करते हुए, और कुछ समय उसके मेहमान की तरह रुका।
कुछ अरसे बाद घर में एक शादी थी, और बारात शिरडी के लिए चली। फकीर भी साथ हो लिया। किसी को ठीक-ठीक न पता क्यों। वह बस चला आया।
शादी हुई। और जब सब निपट गया, और मेहमान खंडोबा के मंदिर के पास गाड़ियों से उतर रहे थे, वह नौजवान फकीर भी उतरा, और फिर वापस न चढ़ा।
वहाँ म्हालसापति नाम का एक आदमी खड़ा था। वह मंदिर में सेवा करता था; उसने अपनी सारी उम्र पवित्र चीज़ों के बीच बिताई थी, और शायद इसीलिए उसने वह देख लिया जो बारात के बाक़ी लोग चूक गए। उसने उस नौजवान अजनबी के चेहरे की ओर देखा।
और फिर, बड़े प्रेम से, मानो उसी की राह देख रहा हो, बोला:
“आओ, साईं।”
एक मामूली-सा स्वागत, और कुछ नहीं। पर वह नाम उस नौजवान फकीर पर ठहर गया, और वहीं रह गया। साईं। और जल्द ही, स्नेह और श्रद्धा से, लोग उन्हें साईं बाबा कहने लगे।
शादी बीत गई, बाक़ी सब लौट गए। बाबा न लौटे।
न उनका कोई घर था। न कोई सामान। न कोई अपना पास। फिर भी वे रुक गए, और धीरे-धीरे, चुपचाप, लोग उनके इर्द-गिर्द जुटने लगे, ठीक वैसे ही जैसे कभी नीम के नीचे उस लड़के के इर्द-गिर्द जुटे थे, बिना ठीक-ठीक जाने कि क्यों।
वे क्यों रुके? कोई न बता पाता। बस, दुनिया की सारी जगहों में से उन्होंने इसी ग़रीब, धूल भरे गाँव को चुन लिया था।
और अब वह इसे कभी नहीं छोड़ेंगे।